नई दिल्ली। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए धार्मिक और भावनात्मक रूप से विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं। इस दिन सरगी, पूजा-पाठ, करवा माता की कथा और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा निभाई जाती है। व्रत से जुड़े नियमों और सावधानियों के बारे में ज्योतिषाचार्य पंडित शिप्रा सचदेव ने आईएएनएस से बातचीत में जानकारी दी।
सूर्योदय से पहले सरगी खाने की परंपरा
पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार, करवा चौथ के व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पहले सरगी खाने से होती है। सुबह तारों के दिखाई देने के समय सरगी ग्रहण करने के बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद दिनभर निर्जला व्रत रखा जाता है।
रात में चंद्रमा के दर्शन करने और उन्हें अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। परंपरा के अनुसार, महिलाएं अपने पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं।
करवा चौथ पर इन कामों से बचने की सलाह
पंडित शिप्रा सचदेव ने बताया कि करवा चौथ के दिन कुछ पारंपरिक नियमों का ध्यान रखा जाता है। उनके अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन कटिंग और सिलाई जैसे कामों से बचना चाहिए। साथ ही चाकू, कैंची और सुई-धागे का इस्तेमाल नहीं करने की भी परंपरागत सलाह दी जाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि व्रत पूरा होने तक नदी पार करने से बचना चाहिए। ये मान्यताएं धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में इनके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं।
प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व
पंडित शिप्रा सचदेव के मुताबिक, करवा चौथ की पूजा प्रदोष काल में की जाती है। इस दौरान माता गौरी की पूजा और उनके स्वरूप की स्थापना का विशेष महत्व माना जाता है।
उन्होंने बताया कि कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्र होकर करवा माता की कथा सुनती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं। कुछ परंपराओं में दस सुहागिन महिलाओं के एक साथ कथा सुनने और पूजा करने को शुभ माना जाता है। चंद्रमा की पूजा के बाद ही व्रत का समापन किया जाता है।
क्या है बायना निकालने की परंपरा?
करवा चौथ पर बायना निकालने की भी परंपरा है। पंडित शिप्रा सचदेव ने बताया कि बायना में एक थाली में मटकी, फल, मेवे और अन्य पूजन सामग्री रखकर उसे पारंपरिक विधि से घुमाया जाता है। इसके बाद बायना घर की सास या किसी अन्य बुजुर्ग सुहागिन महिला को दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि इस परंपरा में बायना स्वयं ग्रहण करने के बजाय उसे संबंधित बुजुर्ग महिला को देने की मान्यता है।
करवा चौथ पर व्रत और पूजा की विधियां परिवार तथा क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए महिलाएं अपनी पारिवारिक मान्यताओं के अनुरूप पूजा-विधि का पालन करती हैं।


